धुंध से झांक कर
निकलती हुई चांदनी,
धुंध पर पाव रख कर
आती चांदनी,
प्यार के पंख पसार
क्षितिज को नपती
इठलाती चांदनी,
अकेली थी
साथ पागई धुंध का,
चहकती बल खाती
ले साथ धुंध का
उतर आई धरा को
छूने चांदनी,
धुप ने भी पाया
मुकाम प्यार का
खो गई धुप में
मोहब्बत की
आस में चांदनी।
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