मैं नारी हूँ,
जज्बातों से भरी हूँ.
किन्तु दॄढ़ हूँ,
गिरती हूँ उठती हूँ
पुनः:सबल होने को तत्पर,
केवल अपने निश्चय पर चालू ,
ये हो पता नहीं,
आरम्भ भी मैं,
अंत भी मैं,
केवल ठहराव से डरती हूँ मैं,
मेरी सीमाऐं खूँटी पर टांग
बांधी गई स्वार्थो में,
मैं जीवट दिखती,
बरसो बरस से परजीवी,
कहाँ;कैसे क्यों किस समय
जाना,आना,करना,
यह तय कोई और करता,
जीवन मेरा पर
कोई और जीता,
विवशत से डरती हूँ,
मेरी हर सीमाओ को बांधा गया ,
मैं सीमा से डरती हूँ,
जो मुझे संकुचित कराती।
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