तेरी मुस्काती आँखे
खामोसी से कुछ कहने को
उठाती पलक हैं,
गिरती पलक ले जाती
इश्क के गहरे गलियारों में हैं,
तेरे ओठ लरज जाते
कुछ कहने को हैं
जितना कहते लफ्ज तेरे
लगता उससे ज्यादा
छिपा रहे खुद को भीतर हैं,
कभी अबूझ पहेली से
एकदम अनजाने ,
कभी इतने करीब कि
तेरी सांसे लगाती
मेरे दिल के भीतर
धड़क रही मधुर तान लिये हैं,
तेरी भावभरी आँखे
अंदर तक सिहरा देती हैं,
खुमारी में डुबो देती हैं।
No comments:
Post a Comment