फिसलन भरी रेत पर
अपने पदचिन्ह
बनाता चला,
सनक में आती
निर्मम लहर,
मेरे चंद कदमो के निसा
मिटाता चला,
पर वापसी पर
एक निसान फिर भी छूटता,
खाली जगह जो रह जाती,
जो बहुत कुछ
कहता सुनाता गुनगुनाता,
ख़ामोशी में झंझोरता,
दिल और दिमाग की
जंग मजेदार होती,
देह द्वन्द्व नहीं देख पाता,
भीतरी जंग को
ऊर्जा सबलता और चेतना देता।
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