अनुभवों में भी जा मिला
बचपन से,
छाया था मन पर,
बस पलट देह में
बचपन ही तो ना लोटा था,
होठो की हसी पे नचा था,
आसमाँ को मुठी में रखने की
कुवत भरी थी,
किलकारी-सा गुंजन
करता लोटा था ,
जीवन के गलियारों में,
बस पलट बचपन ही
ना लोटा था।
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