घटा बन कर छा जाऊ गिरि पर या
बरस जाऊ मरू में
यह मेरी तमन्ना है ,
तुम क्यों विचली हो,
मैं कलरव करती नदी की
तरह बह जाऊ या,
झरना बन चट्टानों से गिर जाऊ,
प्रकर्ति की घटा में खो जाऊ,
आंधी बन उड़ जाऊ या ,
मंद मस्त बयार बन बह चलूँ,
यह है मेरा जीवन मैं जी भर जी जाऊ,
एक बून्द बंद सीपी का मोती बन जाऊ।,
यह है मेरी आरजू ,
मैं सुबह की ओस की निर्मल बून्द बन जाऊ ,
मैं खो जाऊ,
मैं भी तो उसी रचियता की हूँ रचना।
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