चलने का न सही सम्भलने का हुनर तो आ गया।
2.आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती
हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती
काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती
3.अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला ,
हम ने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला
4.मेरे साथ बैठ के वक़्त भी रोया एक दिन,
बोला बन्दा तू ठीक है,मैं ही खराब चल रहा हूँ..
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